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पृष्ठभूमि

भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (आई.आई.आर.एस) पूर्व में भारतीय फोटो-अर्थनिर्वचन संस्थान (आई.आई.पी-) के नाम से जाना जाता था। उभरती प्रौद्यौगिकियों से सम्बंधित अनुभवी लोगों के सानिध्य में विशिष्ट प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के लिए भारतीय सर्वेक्षण विभाग के तत्वाधान में सन्‌ 1966 में इसकी स्थापना हुई थी। सन्‌ 1970 के आरंभ में सुदूर संवेदन प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रयोग के साथ ही इसमें प्रशिक्षित जनशक्ति की जरूरत को महसूस किया गया तथा सन्‌ 1976 में यह संस्थान नेशनल रिमोट सेन्सिंग एजेन्सी (एन.आर.एस.ए) में विलीन कर दिया गया। सन्‌ 1970 के अंतिम दौर तथा सन्‌ 1980 के आरंभिक समय में प्राकृतिक संसाधनों के सर्वेक्षण तथा प्रबंधन हेतु सुदूर संवेदन एक शक्तिशाली तकनीक के रूप में उभरने लगा । सन्‌ 1980 में (एन.आर.एस.ए), अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार के अधीन किया गया, जो कि राष्ट्र के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए अन्तरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास एवं अनुप्रयोग हेतु एकमात्र केन्द्र है। आई.आई.आर.एस लोगों को प्रशिक्षित कर प्रयोक्ता समुदाय को विस्तृत बनाता है। साथ ही यह आंकड़ा क्रय बाज़ार को भी सक्रिय करता है।

भारत सरकार ने नेशनल रिमोट सेन्सिंग एजेन्सी को एक सरकारी केन्द्र बना कर उसके नाम को परिवर्तित कर भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अधीनस्थ राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र (एन.आर.एस.सी) बनाने की स्वीकृति प्रदान की। यह निर्णय 01 सितंबर, 2008 से प्रभाव में आया। 30 अप्रैल, 2011 से आई.आई.आर.एस की एन.आर.एस.सी से सम्बद्धता समाप्त कर इसे इसरो की एक इकाई बना दिया गया।

अपने आरम्भ से अब तक आई.आई.आर.एस ने एक लंबा सफर तय किया है। फोटो अर्थ-निर्वचन से लेकर सुदूर संवेदन तथा भौगौलिक सूचना विज्ञान तक के सफर ने इस संस्थान को अंतराष्ट्रीय ख्याति प्रदान की है। आज अनुसंधानकर्ताओं से लकर नीति-निर्माताओं तक सभी वर्र्र्गो के प्रयोक्ताओं के लिए इसमें पाठ्‌यक्रम उपलब्ध हैं। आई.आई.आर.एस.का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में मानव क्षमता निर्माण और विकास करना है। यह इन्टरनेट के माध्यम से इलैक्ट्रॉनिक पाठ्‌यक्रमों के विकास पर भी अपना ध्यान केन्द्रित कर रहा है और राष्ट्र निर्माण संबंधी कार्यक्रमों को तैयार कर उनमें वृद्धि करने के साथ-साथ जन-संपर्क को विकसित करने का कार्य कर रहा है। इसके अलावा आई.आई.आर.एस ने कई महत्वपूर्ण अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं में भी योगदान दिया है, जिसकी वज़ह से अनुप्रयोगों के विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि भूस्खलन, आपदा क्षेत्र का सीमाकंन भूमिगत जल-लक्ष्यक्षेत्र आदि में प्रौद्योगिकी के प्रचालनात्मक रूप को मदद मिली है।
 

 
 
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